मिडिया ओर सुनील कुमार >>>>>सुनील कुमार एक बहतर प्रशासनिक अधिकारी हे इस में दो मत नहीं बेहद सद्की पसंद अधिकारी की इस्तुती जिस तरह से मिडिया में छाई हई हे वह उनके लिए घातक हे सुनील कुमार की पल पल की खबरों के सामने नेता बोने हो गए हें प्रदेश का हार छोटे- बढे अख़बार में उनके कसीदे गढ़े जा रहे हें चमचा गिरी कि भी हद होती हे प्रदेश के बड़े दमदार अख़बार ने हेडिंग लगाई हे की सी एस की टीम को रमन ने नया लुक दिया प्रथम पेज की खबर हे रमन के आगे डाक्टर लगाना भी मुनासिब नहीं समझा खबर नवीस ने अति उत्साही पत्रकार की खबर पढ़ कर एसा लगता हे की रमन सी एस के अंडर में काम करते हें ओर उनकी हार फाइल में रंगरोगन करते हें डॉ रमण सी एस की सयाबसी के मुहताज हें डाक्टर रमन के बारे में वेसे भी यह बात प्रचलित हे की उन में प्रशानिक छमता नहीं हे वह गुड गवर्नेस का ढिंढोरा जरुए पिटते हें पर जमीनी हकीकत कुछ ओर बयाँ करती हे | इसे अख़बार में एक तुरत टिपणी भी छपी हे उसमे गधे को बाप कहने की कहावत का जिक्र हे इस पूरे लेख में बाप कोन ओर गधा कोन हे पर पूरा आलेख केन्द्रित हे लेखक खुद कनफुस हे की वह गधा किसे कहे ओर बाप किसे जिन दो किरदारों पर यह लेख हे केन्द्रित हे उसमे दोनों बाप ही हें एक राजनीती के पुराने बाप हे तो दुसरे आज के प्रसासनिक बाप हे अब बचा बेचारा गधा इस तरह के लेख के अनुसार धोबी का रहा ना घाट का सुनील कुमार के कसीदे गड़ रहा मिडिया क्या संदेस देना चाह ता हे की कोन पत्रकार कितना सुनील कुमार के पास हे ये नजदीक जाने की होड़ कहीं सुनील कुमार को भरी पढ़ जाये >>>>>>>>>>> जय हिंद
मिडिया ओर सुनील कुमार >>>>>सुनील कुमार एक बहतर प्रशासनिक अधिकारी हे इस में दो मत नहीं बेहद सद्की पसंद अधिकारी की इस्तुती जिस तरह से मिडिया में छाई हई हे वह उनके लिए घातक हे सुनील कुमार की पल पल की खबरों के सामने नेता बोने हो गए हें प्रदेश का हार छोटे- बढे अख़बार में उनके कसीदे गढ़े जा रहे हें चमचा गिरी कि भी हद होती हे प्रदेश के बड़े दमदार अख़बार ने हेडिंग लगाई हे की सी एस की टीम को रमन ने नया लुक दिया प्रथम पेज की खबर हे रमन के आगे डाक्टर लगाना भी मुनासिब नहीं समझा खबर नवीस ने अति उत्साही पत्रकार की खबर पढ़ कर एसा लगता हे की रमन सी एस के अंडर में काम करते हें ओर उनकी हार फाइल में रंगरोगन करते हें डॉ रमण सी एस की सयाबसी के मुहताज हें डाक्टर रमन के बारे में वेसे भी यह बात प्रचलित हे की उन में प्रशानिक छमता नहीं हे वह गुड गवर्नेस का ढिंढोरा जरुए पिटते हें पर जमीनी हकीकत कुछ ओर बयाँ करती हे |
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लेखक खुद कनफुस हे की वह गधा किसे कहे ओर बाप किसे जिन दो किरदारों पर यह लेख हे केन्द्रित हे उसमे दोनों बाप ही हें एक राजनीती के पुराने बाप हे तो दुसरे आज के प्रसासनिक बाप हे अब बचा बेचारा गधा इस तरह के लेख के अनुसार धोबी का रहा ना घाट का सुनील कुमार के कसीदे गड़ रहा मिडिया क्या संदेस देना चाह ता हे की कोन पत्रकार कितना सुनील कुमार के पास हे ये नजदीक जाने की होड़ कहीं सुनील कुमार को भरी पढ़ जाये >>>>>>>>>>> जय हिंद