सोच की लकीरों के बादशाह का अंत >>>>>>>>>>>>रजनीश को जीवन समर्पित करने वाले ओशो के भक्त विष्णु सिन्हा ने मुम्बई में जीवन की अंतिम सांसे ली बहुत ही दुखद समाचार था पर इश्वर के आगे किसे कि नहीं चलती विष्णु जी कह करते थे की अल्लू सांसे ते हें ना एक उपर ना एक नीचे मेने अपने जीवन के बहुमूल्य पन्दरह वर्ष उनके सानिध्य में गुजारे में दावे के साथ कह सकता हूँ की मालिक की भूमिका में इतना दबंग संपादक नही देखा ना ही कोई मिशल सुनी विष्णु जी ओर रम्मू जी के विचार बहुत मेल खाते थे विष्णु जी रम्मू जी को भैया ही कहते थे उन दिनों प्रेस के मायने अलग थे चोथे स्तम्भ की गरिमा थी पाठक भी जगरूप था लेखन पर जबरजस्त रियाक्सन होता था उन दिनों अग्रदूत शाम का इकलोता अख़बार होता था प्रसार संख्या भले ही काम थी पर रीडर शिप बहुत थी अख़बार बांटते -बांटते शाम सात बजे अग्रदूत कि खबरे सुर्ख़ियों में रहती थी चाय की गुमटियों में काफी हॉउस में, मेखानो में, जिले के तमाम पुलिश थानों में अग्रदूत का इंतजार होता था ख़बरें राजनीती की हों या अपराध की बिना पढ़े पाठक रह नहीं सकता था पाठक अग्रदूत का एडिक्ट हो गया था अखबार को इस स्तर पर पहुचने वाले विष्णु जी १७ नवम्बर को पाँच तत्व में विलीन हो गए |
मेरा दुर्भाग्य था कि में छत्तीसगढ़ से बहार था मुझे फेस बुक सन्देश पर यह सूचना मिली की विष्णु भैया नहीं रहे बीमार हें यह तो पता था बीमारी भी पता थी में मिलने भी गया था संस्मरणों को लेकर बातें भी हुई थी तमाम खट्टी मीठी यादों को याद कर विष्णु जी की वह मुस्कान हमेश याद रहेगी वो बीमार थे पलंग पर लेते थे उन दिनों शरीर थका था मन नहीं था काफी अरसे के बाद इन परस्तिथियों में मुलाकात हुई थी बातें होते होते लटे सिन्हा जी टिक कर बैठ गए मन बदला बातचीत के दोरान उन्होंने कहा की बहुत दिनों के बाद कुछ बत्याने में मजा आया हे मेने पूछ ही लिया की भैया मजा आया की आनन्द इस पर वो खुल कर हँसे बोले मजा नहीं आनन्द |इस आनन्द मजा में क्या फर्क हे पर सिन्हा जी के तर्कों ने घंटों हँसाया था |
पत्रकारिता के भीष्म पितामह को नमन ...................
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