'via Blog this'महगाई ओर जनसँख्या ये ही सिक्के के दो पहलु हें >>>>>>>सत अरब की जनसँख्या ओर उसके लिए संसाधन, सब को रोटी चाहिए, सब को पानी चाहिए, सब को जीने के लिए जरुरी संसाधन चाहिए |पृथ्वी तो इसके लिए तैयार हे उसे फर्क नहीं पड़ता की उसकी इतनी संताने हें| पृथ्वी के पास उतनी हवा ,पानी हे जमीन हे जंगल हे भोजन हे आराम से जीने के वे सब संसाधन हें| मामला तो उसकी कुछ संतानों ने ख़राब कर रख हे कुछ से मेरा मतलब उस असमानता से हे जो हम ने अपने कर्मो से पैदा की हे पूरे विश्व में कुछ लोगों का कब्ज़ा हो गया हे उन संसाधनों पर जिनका उपयोग करने का अधिकार हम सब को हे इस अतिक्रमण का गिराफ जेसे जसे बढेगा महगाई भी वेसे वेसे बढ़ेगी जिस मुद्रा के भरोसे हमारा जीवन चल रहा था वह काले धान के रूप में एक एसी कल कोठरी में बंद हे जिसका जीवन में कोई उपयोग नहीं हे यदि हमारे देश का कला धन यदि हमारे खजाने में वापिस जमा हो जाये तो २० सालों तक इंधन के रेट बढ़ने की नोबत नहीं आयेगी ,विकाश की दर विश्व में सब से ऊपर होगी हमारा कला धन सिर्फ विदेशों तक ही सीमित नहीं हे हमारे देश में भी बहुत सा कला धन हे जो बोरों में पड़ा सड रहा हे. विदेशों में तो नेताओं का बड़े व्यापारियों का ही कला धन हे इससे कहीं अधिक कला धन हमारे अधिकारीयों के पास हे जो बोरों में दबा पड़ा हे वह धन इतना अधिक हे की उसका उपयोग सिर्फ ओर सिर्फ एयासी में ही खर्च हे रहा हे उदाहरण के तोर पर रिश्वत खोर अफसर कि एक संतान का जेब खर्च बाप की तनखा से कहीं अधिक हे वह हर रोज हजार दो हजार रुपया अपनी एयासी में बिना दर्द के खर्च कर रहा हे बिना किसी हिसाब किताब के उसका लेनदेन हो रहा हे इस तरह
के काले धन से रोजमर्रा की जरूरतें इतनी महगी हो गईं हे की रिश्वत खोर ही उनको आसानी से खरीद पा रहा हे आम इमानदार को तो भाव पूछने में डर लगता हे | मामला पूरा एक तरफ़ा हो गया हे एसे लाखों अफसर हे जिन्हें महगाई की आवाज टी व्ही पर ही सुने देती हे ना दिखाई देती ओर नहीं कभी महसूस हुई हे उन्हें पता ही नहीं की उनके रसोई का बिल अब कितना होगया हे इफराद कमाई रोज हो रही हे वि रोज पेट्रोल के रेट बढ़ा देते हें उनको क्या फर्क पड़ता हे वो अपना रिश्वत का रेट बढ़ा देते हे
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